शनिवार, 20 अगस्त 2022

भगवन महावीर की जीवनी और अनमोल विचार-Bhagwan Mahavira

      

        भगवन महावीर का जन्म ईसा से 599 वर्ष पहले वैशाली गणतंत्र के कुण्डग्राम में इक्ष्वाकु वंश के क्षत्रिय राजा सिद्धार्थ और रानी त्रिशला के यहाँ चैत्र शुक्ल तेरस को हुआ था। ग्रंथों के अनुसार उनके जन्म के बाद राज्य में उन्नति होने से उनका नाम वर्धमान रखा गया था। जैन ग्रंथ उत्तरपुराण में वर्धमान, वीर, अतिवीर, महावीर और सन्मति ऐसे पांच नामों का उल्लेख है। इन सब नामों के साथ कोई कथा जुडी है। जैन ग्रंथों के अनुसार, २३वें तीर्थंकर पार्श्वनाथ जी के निर्वाण (मोक्ष) प्राप्त करने के 188 वर्ष बाद इनका जन्म हुआ था।

                गृह त्याग महावीर स्वामी ने 30 वर्ष की आयु तक गृहस्थ जीवन व्यतीत किया। परंतु सांसारिक जीवन से उन्हें आंतरिक शांति न मिल सकी। जिसके कारण अपने माता-पिता की मृत्यु के बाद उन्होंने अपने बड़े भाई नंदीवर्धन से आज्ञा लेकर 30 वर्ष की आयु में गृह त्याग कर दिया और सन्यासी हो गए। उन्होंने 12 वर्ष तक कठोर तपस्या की। इस अवधि में उन्हें अनेक कष्ट उठाने पड़े। स्वामी महावीर ने दिगंबर साधु की कठिन अंगीकार किया और निर्वस्त्र रहे। श्वेतांबर संप्रदाय जिसमें साधु श्वेत वस्त्र धारण करते हैं। उनके अनुसार महावीर दीक्षा के उपरांत कुछ समय छोड़कर निर्वस्त्र रहे और उन्होंने केवल ज्ञान की प्राप्ति भी दिगंबर अवस्था में ही की। अपने पूरे साधना काल के दौरान महावीर ने कठिन तपस्या की और मौन रहे। जब वे ध्यान मग्न रहकर इधर-उधर घूमते थे तो लोग उन्हें डंडों से पीटते थे, परंतु फिर भी वे पूर्ण रूप से मौन और शांत रहते थे। उन्होंने अपने शरीर के जख्मों को ठीक करने के लिए औषधि तक का भी प्रयोग नहीं किया था।

 विवाह:-

             महावीर स्वामी का विवाह महावीर स्वामी एक राज परिवार से संबंध रखते थे। ऐसे में राजसी वैभव होने के बावजूद भी महावीर जी का मन राज पाठ में बिल्कुल भी नहीं लगता था। महावीर स्वामी को भक्ति और सच्चे ज्ञान के आगे ऊंचे-ऊंचे महल और शानोशौकत बहुत ही फीकी नजर आती थी। एक बार राजा सिद्धार्थ को उनके पुत्र के विवाह के लिए राजकुमारी यशोधरा का विवाह प्रस्ताव आया। राजकुमारी यशोधरा से विवाह करने के लिए राजा सिद्धार्थ ने महावीर स्वामी के समक्ष प्रस्ताव रखा, वास्तव में तो महावीर स्वामी इस विवाह को करने के लिए तैयार नहीं थे। अपितु पिता की आज्ञा के कारण वर्ष महावीर स्वामी को राजकुमारी यशोधरा से विवाह करना हुआ। इस प्रकार महावीर स्वामी की पत्नी राजकुमारी यशोधरा बनी। विवाह के बाद महावीर स्वामी और राजकुमारी यशोधरा को एक बहुत ही सुंदर पुत्र की प्राप्ति हुई। श्वेतांबर समुदाय के लोगों की ऐसी मान्यता है कि महावीर स्वामी का विवाह राजकुमारी यशोधरा से हुआ था और इसी के विपरीत दिगंबर संप्रदाय की यह मान्यता है कि महावीर स्वामी का विवाह नहीं हुआ था, वह बचपन से ही ब्रह्मचारी थे। महावीर स्वामी लगभग 30 वर्ष की उम्र में अपनी राजस्व वैभव और सारी सुख संपन्नताओं को छोड़कर के सच्चे ज्ञान की प्राप्ति के लिए खोज में निकल पड़े। महावीर स्वामी ने अपनी माता-पिता, पत्नी, पुत्री और राज महल इत्यादि को त्याग करके सच्चे ज्ञान की प्राप्ति की खोज में निकल पड़े। अब ऐसे में महावीर स्वामी जंगल में एक अशोक के वृक्ष के नीचे बैठकर के ध्यान लगाने लगे और लगभग साडे 12 वर्षों की कठिन तपस्या करने के बाद उन्हें यथार्थ ज्ञान की प्राप्ति हुई।

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  अहिंसा सबसे बड़ा ज्ञान व धर्म :-

         जैन धर्म ने भारतीय सभ्यता और संस्कृति के विभिन्न पक्षों को बहुत प्रभावित किया है। दर्शन, कला और साहित्य के क्षेत्र में जैन धर्म का महत्वपूर्ण योगदान है। जैन धर्म में वैज्ञानिक तर्कों के साथ अपने सिद्धान्तों को जन-जन तक पहुंचाने का प्रयास किया गया है। अहिंसा का सिद्धान्त जैन धर्म की मुख्य शिक्षा है। जैन धर्म में पशु-पक्षी तथा पेड़- पौधे तक की हत्या न करने का अनुरोध किया गया है। अहिंसा की शिक्षा से ही समस्त देश में दया को ही धर्म प्रधान अंग माना जाता है। जैन धर्म की मानवीय शिक्षाओं से प्रेरित होकर कई दानवीरों ने उपासना स्थलों, औषधालयों, विश्रामालयों एवं पाठशालाओं के निर्माण करवाये। जैन धर्म में अहिंसा तथा कर्मों की पवित्रता पर विशेष बल दिया जाता है। उनका तीसरा मुख्य सिद्धान्त ‘अनेकांतवाद’ है, जिसके अनुसार दूसरों के दृष्टिकोण को भी ठीक-ठाक समझ कर ही पूर्ण सत्य के निकट पहुँचा जा सकता है। जीव या आत्मा का मूल स्वभाव शुद्ध, बुद्ध तथा सच्चिदानंदमय है।

वैराग्य :-

         महावीर स्वामी के माता पिता की मृत्यु के पश्चात उनके मन मे वैराग्य लेने की इच्छा जागृत हुई, परंतु जब उन्होने इसके लिए अपने बड़े भाई से आज्ञा मांगी तो उन्होने अपने भाई से कुछ समय रुकने का आग्रह किया| तब महावीर स्वामी जी ने अपने भाई की आज्ञा का मान रखते हुये 2 वर्ष पश्चात 30 वर्ष की आयु मे वैराग्य लिया. इतनी कम आयु में घर का त्याग कर ‘केशलोच’ के साथ जंगल में रहने लगे. वहां उन्हें 12 वर्ष के कठोर तप के बाद जम्बक में ऋजुपालिका नदी के तट पर एक साल्व वृक्ष के नीचे सच्चा ज्ञान प्राप्त हुआ. इसके बाद उन्हें ‘केवलिन’ नाम से जाना गया तथा उनके उपदेश चारों और फैलने लगे. बडे-बडे राजा महावीर स्वा‍मी के अनुयायी बने उनमें से बिम्बिसार भी एक थे. 30 वर्ष तक महावीर स्वामी ने त्याग, प्रेम और अहिंसा का संदेश फैलाया और बाद में वे जैन धर्म के चौबीसवें तीर्थंकर बनें और विश्व के श्रेष्ठ महात्माओं में शुमार हुए. तीस वर्ष की आयु मे महावीर स्वामी ने पूर्ण संयम रखकर श्रमण बन गये, तथा दीक्षा लेते ही उन्हे मन पर्याय का ज्ञान हो गया. दीक्षा लेने के बाद महावीर स्वामी जी ने बहुत कठिन तापस्या की| और विभिन्न कठिन उपसर्गों को समता भाव से ग्रहण किया. साधना के बारहवे वर्ष मे महावीर स्वामी जी मेढ़िया ग्राम से कोशम्बी आए और तब उन्होने पौष कृष्णा प्रतिपदा के दिन एक बहुत ही कठिन अभिग्रह धारण किया. इसके पश्चात साढ़े बारह वर्ष की कठिन तपस्या और साधना के बाद ऋजुबालुका नदी के किनारे महावीर स्वामी जी को शाल वृक्ष के नीचे वैशाख शुक्ल दशमी के दिन केवल ज्ञान- केवल दर्शन की उपलब्धि हुई.

 अनमोल विचार :-

 1. किसी आत्मा की सबसे बड़ी गलती है कि अपना असली रूप को ना पहचनना और यह गलती केवल आत्मज्ञान प्राप्त करके ही ठीक की जा सकती हैं।

2.आपकी आत्मा से परे कोई भी शत्रु नहीं है। असली शत्रु आपके भीतर रहते हैं, वो शत्रु हैं क्रोध, घमंड, लालच, आसक्ति और नफरत।

3.खुद पर विजय प्राप्त करना लाखों शत्रुओं पर विजय पाने से बेहतर है।

4.स्वयं से लड़ो, बाहरी दुश्मन से क्या लड़ना? वह जो स्वयम पर विजय कर लेगा उसे आनंद की प्राप्ति होगी।

5.ईश्वर का कोई अलग अस्तित्व नहीं है। सही दिशा में सर्वोच्च प्रयास करने से हर कोई देवत्व को प्राप्त कर सकता है।

6.“हर एक जिव स्वतंत्र होती है। वे एक दुसरे पर निर्भर नही रहती।

7.एक व्यक्ति जलते हुए जंगल में एक ऊँचे पेड़ पर बैठा था। वह सभी जीवीत प्राणियों को मरते हुए देख रहा था, लेकिन वह यह नही समझ पाया की जल्द ही उसकी भी वही दशा होने वाली है। मुर्ख है ऐसे आदमी!

8.एक लाख शत्रुओं पर जीत हासिल करने के बजाय स्वयं पर विजय प्राप्त करना बेहतर है।

9.“भगवान का कोई अलग अस्तित्व नही है। हम सभी सही दिशा में अच्छी कोशिशे कर के भगवानो जैसी शक्तिया प्राप्त कर सकते है।

10.सभी इंसान अपनी ही गलतियों की वजह से दुखी होते है, और वे खुद अपनी गलतिया सुधारकर खुश हो जाते है।

11.जिस तरह आपको दुख पसंद नहीं है, उसी तरह दूसरे भी इसे पसंद नहीं करते हैं। यह जानते हुए भी, आपको  दूसरों के साथ वही व्यवहार करना चाहिए जो आपको खुद के लिए पसंद हो।

12.जिसने भय को पार कर लिया है, वह समभाव का अनुभव कर सकता है।

13.भगवान् का अलग से कोई अस्तित्व नहीं है . हर कोई सही दिशा में सर्वोच्च प्रयास कर के देवत्त्व प्राप्त कर सकता है .

14.जीओ और जीने दो,किसी को दुःख मत दो क्योंकि सभी का जीवन उनके लिए प्रिय होता है.

15.सभी मनुष्य अपने स्वयं के दोष की वजह से दुखी होते हैं , और वे खुद अपनी गलती सुधार कर प्रसन्न हो सकते हैं .

16.स्वयं से लड़ो , बाहरी दुश्मन से क्या लड़ना ? वह जो स्वयम पर विजय कर लेगा उसे आनंद की प्राप्ति होगी .

17.किसी आत्मा की सबसे बड़ी गलती अपने असल रूप को ना पहचानना है , और यह केवल आत्म ज्ञान प्राप्त कर के ठीक की जा सकती है .

18.आत्मा अकेली आती है और अकेली जाती है उसका न कोई साथ देता है और न ही मित्र बनता है.

19.हर एक जीवित प्राणी के प्रति दया रखो . घृणा से विनाश होता है .

20.क्रोध हमेशा अधिक क्रोध को जन्म देता है और क्षमा और प्रेम हमेशा अधिक क्षमा और प्रेम को जन्म देते हैं.

            कृपया इन Motivational Quotes in Hindi को आप बहुत ध्यान से पढ़िए और सफलता की ओर एक और कदम बढ़ा दीजिये - हमें आशा है कि आपको यह article बहुत  पसंद आया होगा भगवन महावीर की जीवनी और अनमोल विचार कैसा लगा कमेंट में जरुर बताये और इस शेयर भी जरुर करे. इस जानकारी में त्रुटी हो सकती है। यदि आपको भगवन महावीर की जीवनी और अनमोल विचार में कोई त्रुटी दिखे या फिर कोई सुझाव हो तो हमें जरूर बताएं।